लोक भाषा ‘‘छत्तीसगढ़ी और हलबी‘‘ का एक घ्वनात्मक अध्ययन
हितेष कुमार1, हर्षित शर्मा2
1शोध छात्र, भाषाविज्ञान, साहित्य एवं भाषा अध्ययनशाला,
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (छत्तीसगढ)
2छत्तीसगढ राज भाषा आयोग, शहीद स्मारक भवन, रायपुर (छत्तीसगढ)
’ब्वततमेचवदकपदह ।नजीवत म्.उंपसरू जपूंतपीपजमेी991/हउंपसण्बवउए ेींतउं011285/हउंपसण्बवउ
।ठैज्त्।ब्ज्रू
हलबी और छत्तीसगढ़ी लोकभाषा दोनांे की भाषावैज्ञानिक यात्रा ष्इण्डो युरोपियनष् भाषा परिवार की सदस्यता से शुरु होकर उसके इण्डो-इरानियन शाखा से गुजरते हुए उसके उपशाखा इण्डो-आर्यन भाषा परिवार तक साथ चली, फिर भारत के पूर्वी व केन्द्रीय क्षेत्र में जाकर ये दोनों अलग हो गये। ष्छत्तीसगढ़ी ष् छत्तीसगढ़ राज्य में पूर्वी हिन्दी भाषा परिवार की एक सशक्त सदस्य बन कर उभरी, वहीं ष्हलबीष् भारत के पश्चिमी भाग में हल्बिक भाषा परिवार की सदस्यता तक सीमित न रह कर एक जीवन्त ष्लिन्गुआफ्रें्रकाष् बन गई, जो अपने ऐतिहासिक विकास क्रम में छत्तीसगढ के बस्तर इलाके में लोकभाषाओं के अनोखे पुर्नमिलन को रेखांकित करती है। आज समूचे भारत में 7 लाख लोगों द्वारा हलबी और 2 करोड़ लोगों के द्वारा छत्तीसगढ़ी बोली जाती है। इस शोध पत्र में स्वन-प्रकृति को आधार बना कर इन दोनों भाषाओं की एक नवीनतम घ्वनात्मक भाषा वैज्ञानिक तुलना प्रस्तुत की गई है जो उनके अनुवंाशिकता व ष्आद्य भाषाष् की पुर्नरचना को रेखांकित करती है ।
ज्ञम्ल्ॅव्त्क्ैरू छत्तीसगढ़ी, हलबी
प्रस्तावनाः-
भाषा केवल परस्पर सवांद का जरिया नही हैं । यह मानव की भावना, सस्ंकृति, व्यक्तित्व रचना, व पहचान जैसे अनेक अभिव्यक्तियों का माध्यम भी है ख्24, । इन विविधताओं को लेकर आज 7000 भाषाऐं पृथ्वी पर मौजूद हैं जो किसी न किसी भाषा परिवार के सदस्य हैं । इनमें से बहुत सी भाषाऐं इन्डो युरोपियन भाषा परिवार की सदस्य हैं। एक ही परिवार के सदस्य होने के नाते उनमें समानता का कारण उनका एक पूर्वज से श्रृजित होना है। इसके बावजूद इनमें भाषावैज्ञानिक सम्बन्धों को जानने में कठिनाई का एक वजह यह है कि ऐसे भाषाओं के व्यंजन, स्वर तथा व्याकरण सरंचना, एक ही समूह से ताल्लूक रखते हैं ख्23, । ऐतिहासिक भाषा विज्ञान, भाषा विज्ञान का वह अध्ययन क्षेत्र है जिसमें भाषा का समय के साथ आए परिवर्तन का अध्ययन किया जाता है। तुलनात्मक भाषाविज्ञान ऐतिहासिक भाषाविज्ञान की उपशाखा है, जहाँ भाषाआंे की तुलनात्मक अध्ययन, उनकी ऐतिहासिक संबद्वता को स्थापित करने के लिए किया जाता है। मानव इतिहास में भाषाओं की तुलना करने की परम्परा काफी पुरानी रही है । रोमन लोगों ने ईसा के जन्म से एक सदी पहले ग्रीक और लेटिन भाषा में समानता जानने की पहल कर ली थी, किन्तु तुलनात्मक विधि का विकास उन्नीसवीं सदी में हुआ। दरअसल तुलनात्मक विधि वह तकनीक है जिसमें भाषाओं के विकास का अध्ययन उनके साझा पुर्वजों से समान अवतरण के जरिये उनके रुपों की तुलना उनके पुर्वज भाषाओं के गुणों के आधार पर किया जाता है । आमतौर पर इस विधि का उपयोग किसी भाषा के प्रागऐतिहासिक अवस्था की पुर्नरचना, भाषा के एतिहासिक दस्तावेज में मौजूद रिक्तता को भरने के लिए अथवा उसके भाषा वैज्ञानिक विकास को जानने के लिए किया जाता है। सुप्रसिद्व डेनिस भाषावैज्ञानिक रसमस रास्क ने 1818 में जर्मेनिक और ग्रीक भाषा के तुलनात्मक अघ्ययन ख्01, के लिए ष्ग्रीम नियमष् का इस्तेमाल किया । तुलनात्मक विधि में लगातार संशोधन होते रहे, हांलाकि कोई एक सर्व मान्य विधि नही बन सका । बहरहाल, इस विधि के को प्रयुक्त करने के लिए केम्पबेल ख्02,ए क्रावले ख्03, तथा लेहमान ख्04, आदि के कथनों के आधार पर इस शोध पत्र में हलबी और छत्तीसगढी भाषा की ध्वनात्मक तुलना करने के लिए पंाच चरण विकसित किये गये है। इसके पहले दोनों की ऐतिहासिक पृष्टभूमि निम्नासुसार प्रस्तुत है:
छत्तीसगढ़ी लोकभाषा
ग्रियर्सन ख्05, ने अपने भाषाई सर्वे में पूर्वी हिंदी की अन्य बोलियों के समान छत्तीसगढ़ी की उत्पत्ति को अर्ध - मागधी से मानी तथा छत्तीसगढ़ी लोकभाषा को हिंदी का दक्षिण-पूर्वी रूप कहा था । ग्रियर्सन ख्05, ने ‘‘ए लिंग्विस्टिक सर्वे आॅफ इंडिया‘‘ के छ्ठवें खंड मंे पूर्वी हिंदी की अन्य दो लोकभाषा, ष्अवधीष् और ष्बघेलीष् के साथ ष्छत्तीसगढ़ीष् का सर्वप्रथम विवरण प्रस्तुत किया। छत्तीसगढी भाषा मुख्यतः छत्तीसगढ़ राज्य में बोली जाती है इसके अलावा यह झारखंड, असम, जम्मू राज्यों तथा दक्षिण अफ्रीका के प्रवासियों द्वारा भी उपयोग में लाई जाती है । एतिहासिक क्रम में वर्ष 1890 में सर्वप्रथम हीरालाल काव्योपाध्याय ख्06, ने छत्तीसगढ़ी बोली का व्याकरण लिखा। वर्ष 1969 में डाॅ. कांतिकुमार जैन ख्07, ने ष्छत्तीसगढ़ी बोली व्याकरण और कोषष् नांमक पुस्तक में छत्तीसगढ़ी का एक भाषावैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया। उसी वर्ष, दयाशंकर शुक्ल ख्08, ने अपने पुस्तक में छत्तीसगढ़ी लोक-साहित्य का अध्ययन प्रस्तुत किया। वर्ष 1972 में डाॅ. रमेशचंद्र महरोत्रा ख्09, ने अपने शोध पत्र में छत्तीसगढ़ी का एक भाषावैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया। वर्ष 1979 में मन्नुलाल यदु ख्10, ने अपने पुस्तक में छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया । उसी वर्ष डाॅ. नरेन्द्र देव वर्मा ख्11, ने अपने पी.एच.डी के शोध गं्रथ में ष्छत्तीसगढ़ी भाषा का उद्विकासष् शीर्षक से छत्तीसगढी का एक भाषावैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया। वर्ष 2003 में, डाॅ. बिहारी लाल साहू ख्12, ने अपने पुस्तक ष्छत्तीसगढ़ी भाषा और लोकसाहित्य ष् में छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य का एक भाषा वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया। वर्ष 2010 में अपने पुस्तक में डा. शंकर शेष ख्13, ने छत्तीसगढ़ी का भाषाशात्रीय अध्ययन प्रस्तुत किया।
हलबी लोकभाषा
ग्रियर्सन ख्05, ने लिखा था कि जब वे पूर्व की ओर हिन्दी की बोलियों काम करते हुऐ बढते जा रहे थे, उसी समय प्रो. स्टेनकोनोव पश्चिम की ओर से मराठी भाषा पर काम करते हुऐ बढते हुऐ एक ऐसे संधिस्थल पर पहंुचे जहां हलबी बोली जाती थी । हल्बी जनभाषा हल्बा जाति के बोली मानी जाती है। इस जाति के लोग छत्तीसगढ के बस्तर सभंाग में काफी तादात में निवास करते हैं। भालचंद्र राव तैलंग ख्14, ने अपने पुस्तक में बताया है कि ष्हलबाष् शब्द की व्युत्पत्ति के संबंध में विचार करते हुए अमेंरिकन एवेंजेलिकल मिशन रायपुर के पादरी ने कहा था कि यह कन्नड़ भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है प्राचीन अथवा आदिम निवासी । श्री तैलंग ख्14, ने अपने पुस्तक में यह भी बताया कि गंगाधर सामंत नामक विद्वान ने लिखा है कि ष्हल्बाष् जनजाति के बस्तर आगमन के फलस्वरूप बस्तर में पूर्व से प्रचलित क्षेत्रीय भाषाऐं उड़िया, भतरी और छत्तीसगढ़ी के मैदानी इलाकों से बस्तर आकार बसनेे वाले छत्तीसगढ़ी भाषियों के कारण ष्छत्तीसगढ़ीष् से इसका अंतः संबंध हुआ और उसका वर्तमान स्वरूप विकसित हुआ। उनके अनुसार हल्बा लोग अपने को ष्पाइकष् कहते है। पाइक शब्द सैनिक अर्थवाचक है। इससे लगता है कि सम्भवतः सैनिकों के रुप में ष्हल्बाष् जनजाति के आगमन के कारण भी बस्तर क्षेत्र में पारस्परिक वैचारिक आदान-प्रदान का माध्यम बनने में हल्बी समर्थ हुई होगी । हल्बी को बस्तर की ‘लिग्वाफ्रेंका‘ भी कहा जाता है। मूलतः ष्हलबीष् हलबा जाति की मातृभाषा है। हलबी भाषा छत्तीसगढ़ के अलावा, आन्ध्रप्रदेश, उड़िसा तथा महाराष्ट्र में कई जगहों पर बोली जाती है। लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इन्डिया के आकंडों ख्5, के आधार पर वर्ष 1828 में छत्तीसगढ़ में हलबी बोलने वाले 123284 थे जोकि 2001 की जनगणना में 544874 हो गई। उसी तरह 1828 में छत्तीसगढ़ में 3214040 छत्तीसगढी़ बोलने वाले थे जो वर्ष 2001 की जनगणना ख्15, में 12726781 हो गई। पण्डित केदारनाथ ठाकुर ख्16, द्वारा रचित ग्रंथ ष्बस्तर भूषणष् वर्ष 1908 में प्रकाशित हुआ जिसमें हलबी भाषा की सक्षिप्त जानकारी दी गई। इसके बाद, वर्ष 1937 में ठाकुर पूरन सिंह ख्17, ने ष्हल्बी भाषा बोधष् नामक की रचना की जिसमें हलबी भाषा के शब्दों का सग्रंह व उसमें व्याकरण की भूमिका प्रस्तुत किया। 1945 में आर.के.एम. बेट्टी ख्18, ने ष् ए हल्बी ग्रामर‘ष् नामक पुस्तक की रचना की ।
छत्तीसगढ़ी और हलबी की घ्वनात्मक तुलना -
1891 के सेन्सस रिपोर्ट ख्19, में कर्नल ग्लासफोर्ड्र ने स्पष्ट लिखा है कि हल्बी अधिकांशतः छत्तीसगढी के समान है । दोनों का वर्तमान लिपि देवनागरी है एवं वाक्य विन्यास ैव्ट है । भालचंद्र राव तैलंग ख्14, द्वारा सन् 1966 में नागपुर विश्वविद्याालय में जो पीएच.डी. थिसिस जमा की गई उसमें छत्तीसगढ़ी, हलबी, तथा भतरी भाषाओं का अलग अलग भाषा वैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत किया गया । यह थिसिस बाद में पुस्तक के रुप में भी प्रकाशित हुआ। लाला जगदलपुरी ने अपने ष्बस्तरष् नामक पुस्तक ख्21, में इन दोनों जनभाषाओं के सांस्कृतिक पृष्टभूमि का एक अध्ययन प्रस्तुत किया । वर्ष 2015 में बड़ौदा से प्रकाशित लोक सर्वेक्षण ख्22, के खंड संपादकीय में डा. चितंरन्जन कर ने हल्बी का एक संक्षिप्त परीचय प्रस्तुत किया। अभी, पिछले वर्ष ं हरिहर वैष्णव ख्23, ने भी अपने पुस्तक ष्बस्तर -लोकष् में छत्तीसगढ़ी और हल्बी भाषा की सास्ंकृतिक तुलना की है। लेकिन उक्त सभी कायों में स्वनात्मक तुलनात्मक विधि का उपयोग उल्लेखित नही था। इस तत्थ को ध्यान में रख कर पंाच चरणेंा में विकसित तुलनात्मक विधि निम्नानुसार है -
प्रथम चरण
सजातीय शब्दों का संग्रहण:
इस चरण के अन्र्तगत दोनों भाषाओं के ऐसे सक्षम सजातीय शब्दों की सूची का संग्रहण किया जायेगा है जिनकी तुलना किया जाना है । ऐसे शब्दों में समान अर्थ के साथ बार बार मिलान दिखाई देना उनमें अनुवांशिक समानता का द्योतक है।
द्वितीय चरण
शब्द समूहों की रचना:
इस चरण के अन्र्तगत प्रथम चरण में संकलित सजातीय शब्दों को सज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया विषेषण एवं क्रिया के आधार पर समान षब्द समूह निर्मित किया गया है । ऐसे अनेक समान षब्दों का होना इनके एक ही मूल का होने का प्रमाण है।
तृतीय चरण
ध्वनात्मक संरचना :
इस चरण के अन्र्तगत द्वितीय चरण में संकलित सजातीय षब्द समूहों में से शब्दों का स्वर एवं व्यन्जन में विभाजन कर ध्वनात्मक संरचना तैयार किया गया है ऐसे अनेक शब्दों में नियमित घ्वनि साम्य पाया जाना का होना उनके एक मूल होना को स्थापित करता हैं ।
चतुर्थ चरण
स्वनिमों का निर्धारण:
इस चरण के अन्र्तगत तृतीय चरण में विभाजित सजातीय षब्द समूहों की घ्वनात्मक संरचना कर स्वनिमों का निर्धारण किया गया है ।
पन्चम चरण
स्वनिमों का वितरण:
इस चरण के अन्र्तगत चतुथ्र्र चरण में निर्धारित घ्वनात्मक संरचना में प्रस्तुत सजातीय शब्द समूहों के षब्दों के स्वनिमों का वितरण वर्गीकृत किया गया है ।
उपरोक्त विधि का क्रियावयन
प्रथम चरण में उक्त विधि को प्रयुक्त कर ष्हलबीष् और ष्छत्तीसगढ़ीष् पर भाषावैज्ञानिक टृष्टि से ध्वनात्मक तुलना करने के लिए बतौर अनियमित नमूना, 25 सजातीय षब्द संकलित कर उनके अर्थ के साथ निम्न तालिका - 1 में प्रस्तुत किया गया हैं:
द्वितीय चरण के अन्र्तगत , प्रथम चरण में संकलित सजातीय शब्दों को संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया एवं क्रिया विषेषण के आधार पर तालिका - 2 में निम्न शब्द समूह निर्मित किये गये हैं:
तृतीय चरण के अन्र्तगत , द्वितीय चरण में संकलित सजातीय षब्द समूहों के षब्दों का स्वर एवं व्यन्जन में विभक्त कर उनकी घ्वनात्मक संरचना निम्न तालिका - 3 में प्रस्तुत की गई है:
अवलोकन
हिन्दी में स्वनात्मक स्वरुप के अध्ययन के तीन आधार माने गये हैं - उच्चारण, प्रसरण तथा श्रवण । भाषा के श्रावणिक ध्वनि को स्वर और व्यंजन में विभाजन सर्वविदित है । यह निम्नानुसार हैं -
1. स्वर: अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ और औ
2. व्यन्जन: क ख ग घ ङ च छ ज झ ´ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व ष स ह
छत्तीसगढ़ी व हलबी स्वर व्यंजन निम्न माने गये हैं:
छत्तीसगढ़ी ख्11 , -
1. स्वर:- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ।
2. संध्यक्षर:- छत्तीसगढ़ी में दो संध्यक्षर है - ऐ, औ।
3. व्यजंन:- क्, ख् ग् घ् ङ् च् छ् ज् झ् ट् ठ् ड् ढ् त् थ् द् ध् न् प् फ् ब् भ् म् य् र् ल् व् स् ह् इसके अतिरिक्त व्यंजन में न्ह, म्ह, र्ह, ल्ह्, ड़्, ढ़् को जोड़ कर कुल 35 व्यंजन होते है।
हलबी ख्14 , -
1. स्वर:- अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ, ऐ, औं
3. व्यजंन:- क्, ख्, ग्, घ्, च्, छ्, ज्, झ्, ट्, ठ्, ड्, ढ्, त्, थ्, द्, ध्, न्, प्, फ्, ब्, भ्, म्, य्, र्, ल्, व्, स्, ह्,
प्रथम चरण में दोनों भाषाओं के संकलित षब्दों (तालिका -1) जिनका अर्थ समान हैं , ऐसे सजातीय षब्दों का द्वितीय चरण में संज्ञा, सर्वनाम, विषेषण, क्रिया विषेषण एवं क्रिया में विभाजन (तालिका -2) के पष्यात तृतीय चरण में घ्वनात्मक संरचना (तालिका -3) में प्रस्तुति से स्पष्ट है कि इनमें स्वर तथा व्यंन्जनों में नियमित ध्वनि साम्य मौजूद है जो इनके अनुवांषिकता व एक मूल होने को प्रमाणित करता है । चतुर्थ चरण में दोनों भाषाओं के स्वनिम निर्धारण (तालिका -4) के पष्यात, पचंम चरण में प्रस्तुत स्वनिम वितरण से स्पष्ट है कि उपरोक्त षब्द समूहों में स्वनिमों के वितरण 4 प्रकार के हैं:
(1). सजातीय षब्द समूह, जिनमें छत्तीसढी भाषा के षब्द का स्वनिम हलबी भाषा के समान षब्द में रिक्त है:
(2). सजातीय षब्द समूह जिनमें छत्तीसढी भाषा के षब्द के स्वनिम के लिए हलबी भाषा के समान षब्द में स्वनिम परिर्वतित है:
(3). सजातीय षब्द समूह जिनमें जिनमें छत्तीसढी भाषा के षब्द के लिए हलबी भाषा के समान षब्द में अतिरिक्त स्वनिम जोडे एवं / अथवा छोडे गये हंै:
(4). सजातीय षब्द समूह जिनमें छत्तीसढी भाषा के षब्द के लिए हलबी भाषा के समान शब्द में सभी स्वनिम समान / भिन्न हंैः
निष्कर्ष
पहला, तालिका 1 - 4 में उल्लेखित तत्थों के आधार पर स्पष्ट है कि समान अर्थ के साथ सजातीय शब्दों के समूह में स्वरों का साम्य इनके अनुवांषिकता तथा एक मूल का होने को पुनः प्रमाणित करता है जिसे तालिका 5- 7 में प्रस्तुत ध्वनि स्वनिमों के वितरण की विभिन्न स्थितियां पुष्ट करती हैं । दूसरा, रिक्त स्वनिमों को ष्आद्य स्वनिमष् के रुप में रख ष्आद्य भाषाष् की पुर्नरचना की जा सकती है । तीसरा, तालिका 8 में प्रस्तुत अन्त के चार षब्दों में स्वनिमों का वितरण, हलबी भाषा पर छत्तीसगढी के अतिरिक्त दूसरे भाषा परिवार के प्रभाव की ओर संकेत करती है ।
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Received on 18.08.2018 Modified on 02.09.2018
Accepted on 22.09.2018 © A&V Publications All right reserved
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